कैसे ट्रीट करता है एक पोएट्री थेरेपिस्ट?

  पोइट्री थेरेपिस्ट का काम एक प्रशिक्षित कवि होना चाहिए, यदि वह स्वयं में कवि न भी हो, तो भी उसे कविता की समझ होनी चाहिए। उसमें करुणा और समझदारी अपेक्षित है। थेरेपिस्ट को अपने लक्ष्य की पूरी जानकारी होनी चाहिए। लेकिन उसका लक्ष्य मात्र रोगी का रोग निवारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह चिकित्सक नहीं है। संभवतः रोग का निवारण संभव भी नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति में थेरेपिस्ट रोगी में पीड़ा को झेलने की क्षमता को बढ़ा सकता है। वह उसके मन को वहां ले जा सकता है, जहां से वह अपने को ही दूर से देख सके, और यह विचार कर सके कि ऐसा क्या रह गया, जिसे वह कर नहीं पाया? थेरेपिस्ट उसे उस ज़िन्दगी की याद दिलाता है, जिसे वह जीना चाहता था, लेकिन जी नहीं पाया। जैसे कैंसर के अनेक रोगियों को याद आता है कि वे घूमना चाहते थे, लेकिन काम के कारण नहीं घूम पाये। अनेक रोगी कीमियों के बाद घूमने गये।

मेरी परिचित एक महिला थीं, जिन्हे ब्रेस्ट कैंसर हुआ था। वह ब्रेस्ट रिमूवल के बाद वे ठीक भी होने लगी थीं। लेकिन उन्हें यही चिन्ता सताती थी कि उनके बाल नहीं हैं, वे बिना ब्रेस्ट के बदसूरत लग रही हैं। मैंने उनसे कहा कि आप वेषभूषा बदल लीजिए, सलवार और ढीले कमीज़ पहनिए, जिससे कुछ महसूस ही नहीं होगा और विग भी खरीद लें। वे कहने लगीं कि उनके पति कहते हैं कि मुझे तो तुम ऐसी ही ठीक लगती हो, दरअसल वे विग खरीदने गयीं भी, लेकिन महंगे लगे। मैंने पूछा, सवाल यह है कि आप अपने को कैसे देखती हैं? ज़रूरी यह है कि आप ख़ुद में सम्पूर्ण समझें। लेकिन उस पीढ़ी में महिलाओं की कंडीशनिंग हो गयी है कि उनका सजना सजाना सिर्फ़ पति के लिए ही है।

एक पोइट्री थेरेपिस्ट को रोगी के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित करने का लक्ष्य रखना चाहिए, इसके साथ उसे उसकी व्यक्तिगत स्थिति का सम्मान करना चाहिए। उसे रोगी के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए।

रोग के प्रति समाज का नज़रिया बहुत अजीब-सा होता है। अधिकतर समाजों में रोग को सामान्यतया व्यक्तिगत पाप-पुण्य से जोड़ दिया जाता है। अधिकतर रोगी को समाज में अपमानित भी होना पड़ता है। जैसे कुछ वक़्त पहले तक कुष्ठ रोगी को गांव से बाहर निकाल दिया जाता था। तपेदिक के रोगी को भी दूर भेज दिया जाता था। इसी तरह का नज़रिया कैंसर के प्रति है। कैंसर जितनी कठिन बीमारी है, उतनी ही मानसिक रूप से तोड़ने वाली है। समाज भी कैंसर का नाम सुनते ही सिर्फ़ मौत की कल्पना करता है, जबकि वास्तविकता में कुछ स्थितियों में कैंसर ठीक भी हो सकता है।

दूसरी बात यह है कि इस रोग में अधिकतर उपचार कठिन और तकलीफ़दायक होता है। इस तकलीफ़ को समझना सबके बस की बात नहीं है। यहां तक चिकित्सक भी नहीं समझ पाता है। तीसरी समस्या मानसिक स्थिति भी डांवाडोल हो सकती है।

मैंने ग्लेन कॉलेजा, जो कवि होने के साथ थेरेपिस्ट भी हैं, से बात की। बातचीत ईमेल के ज़रिये ही हो पायी। उन्होंने अनेक कैंसर पीड़ितों का साक्षात्कार लिया था। उनके अनुभवों को रिकॉर्ड भी किया था। ये संवाद अधिकतर भावुकता भरे होते थे। वे मेडिकल शब्दजाल में न उलझकर सामान्य बातचीत करते थे। मैंने उनसे सवाल पूछा था, “कवि या किसी भी कलाकार के लिए कैंसर एक चुनौतीपूर्ण विषय है क्योंकि वह आसानी से मेलोड्रामा या भावुकता का शिकार हो सकता है। आप अपने काम में इससे कैसे बचना चाहेंगे?” उनका जवाब था कि जिस तरह मैं अपने लेखन के लिए सामग्रियां एकत्रित करता हूं, बिल्कुल वैसे ही रोगी के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ। यह शारीरिक रोग के साथ भावुकता भरा भी होता है। यहां मेलोड्रामा की स्थिति उपस्थित हो सकती है क्योंकि इसका सीधा संबंध मृत्य से जोड़ लिया जाता है। जिस तरह हम कविता लिखते वक्त केवल विषय पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते, बल्कि यह भी देखते हैं कि छन्द, लय भाव आदि का कैसे प्रयोग करना चाहिए। उसी तरह से मुझे रोगी से बात करते हुए मात्र रोग नहीं, उसकी ज़िन्दगी के अन्य पहलुओं पर ध्यान देना पड़ता है।

उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रचनात्मकता और कल्पना को परिष्कृत, उच्च श्रेणी की बातचीत से अधिक महत्व दिया जाये। पोइट्री थेरेपी या काव्य चिकित्सा किसी व्यक्ति या समूह के साथ की जा सकती है।

ग्लेन कॉलेजा ने कविता के बारे में बताते हुए कहा कि “कविता का अभ्यास उसके कथ्य से महत्वपूर्ण है। यह बात रागात्मक कवियों पर ज़्यादा लागू होती है। कविता लिखना और रचना करना शब्दों के इस्तेमाल के बारे में नहीं है, बल्कि यह है कि आप उन्हें कैसे रचते हैं… इसलिए यह सब मीटर, लय, संगीत, स्वर, असंगति के साथ-साथ प्रयोग, जोखिम, दुर्घटना और जादू के बारे में है। मैं इसी सब पर काम करता हूँ।”

ग्लेन कॉलेजा का भी मानना था, “मीडिया हमेशा कैंसर की त्रास और अपथ्य में डूबी कहानियां पेश करता है, जो लोगों की कल्पनाशीलता को बाधित करती है। एक लेखक के रूप में, यह मेरे लिए उपयुक्त है। यह मुझे काम करने के लिए कहानियों का एक निरंतर प्रवाह और क्लीशे की बहुतायत सौंपता है जिसे छोड़ा जा सकता है, जिससे खेला जा सकता है और यह परखा जा सकता है कि वे कितने सच हैं। इस परियोजना के पहले कुछ हफ़्तों में, मैं किसी क्लीशे में फंसने या सामान्य मीडिया जो कह रहा है, उसे प्रसारित करने के डर से जितना संभव हो सके भावुकता से दूर रहने को लेकर बहुत सावधान था। लेकिन फिर भावुकता का मुझे हल्का-सा एहसास हुआ और मैंने उसे अपनाना शुरू किया। मूल बात यह है कि भावुकता एक सामान्य घटना नहीं है। जहाँ भी दर्द और दुख है, उसे हमेशा एक व्यक्ति द्वारा अनुभव किया जाता है, एक व्यक्ति जिसके पास अपने निदान से परे जीवन और आकांक्षाएँ हैं। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति संभावित रूप से घातक बीमारी का सामना करता है, तो वह जो अस्तित्वगत विकास और अहसास करता है, वह उसका अपना, पूरी तरह से व्यक्तिगत और विशिष्ट होता है- कभी भी सामान्य नहीं होता। इसलिए संभवतया, आधुनिकतावादी द्वैतवादी सोच में तर्कसंगतता के विपरीत एक वैचारिक रूप में भावुकता की वैसी स्पष्ट मौजूदगी नहीं रहती है, यह सोच अब सौ साल पुरानी होगी।
इसके पीछे असली ख़तरा यह है कि सामान्य सरलीकृत तथ्यों के मुक़ाबले व्यक्तिगत अनुभवों का अलग स्तर हो सकता है, जैसे कि सभी कैंसर कथाएँ एक विषय के रूपांतर हों। कई मायनों में वे हैं। कई अन्य मायनों में वे स्पष्ट तौर पर नहीं हैं… इसलिए मैं व्यक्तिगत कहानियों को सुनना और उनका पता लगाना चाहता था।”

अगली कड़ी में उन कुछ पहलुओं पर बात करूंगी जो इस बारे में मेरे सवालों और ग्लेन के जवाबों से सामने आये…