Category Archives: kritya

ICU – 30, August 2021

ऐसा लगा कि किसी ने जोर से धक्का दिया हो, देह सामने की ओर झुक गई, साथ खड़ी परछाई ने कहा, slowly,एक जाना पहचाना स्पर्श बालो को सहलाता हुआ, गला बुरी तरह से दर्द करने लगा, जागते ही मानों पीड़ाएं जग गई, तभी तो निद्रा शान्तिदायक होती है। तुरन्त ट्राली को दौड़ा कर पोस्ट ICU में लाया गया। शहद से

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THE QUEST FOR THE BEAUTY AND THE WORK AS ITS CURE on Rati Saxena work of Science and Art By FEKT – January 9, 2021

merely a few books from Indian lore passed in our libraries and or inbookshops. And if one was lucky to find something it was in Slavic languages,Serbian and Croatian. I happen to read at my young age The “Kamasutra” ofWatsyayana, intrigued by how deeply it discussed human sexuality I asked tofind more and came across the “Anangaranga of Kalyana Mala.

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Walking through the fire–DORIS KAREVA

Walking through the fireDORIS KAREVA The readership of poetry books seems to be shrinking. Perhaps this is the impression that moreand more poetry books are being published, for example 130 last year. Even fewer readers will pead kõndimaläbi tuleSee pole poeetiline meelisklemine, pigem manifest. See on valmisolek seista oma sõnade taga, mis kajab vastu mitmest teisestki, ka ühest Triin Soometsalepühendatud

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स्त्री देवी से शूद्रा तक

इतिहास और साहित्य दोनो में थोड़ा बहुत प्रवेश होने के कारण मुझे हमेशा लगता रहा है कि हमारे पुरातन परंपरा  में इतिहास में साहित्य और साहित्य मे इतिहास का बड़ा अजीब सा घालमेल है। अधिकतर हम साहित्य में इतिहास और इतिहास मे साहित्य खोजने की भूल कर बैठते हैं, पुराणों में लिखा गया अधिकतर साहित्य की मिथक परंपरा में आता

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जुले लद्दाख ( Part-5) By Rati Saxena

आज यात्रा काफी जल्दी शुरू हो गई क्यों कि हमे सुदूर पर्वतों में बसी पैंगाग स्तो यानी की झील देखने जाना था।  करीब छह बजे हमे डेरे से निकलना था। आज की यात्रा में किरण औरसंजीव के साथ उनका चार साल का गोलमटोल बेटा गोलू भी था। गोलू पर्वतीय माता पिता का बेटा है तो चेहरे पर पर्वतीय भोलापन तो

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जुले लद्दाख – ( Part 4) By Rati Saxena

अगले दिन हमे जल्दी निकलना था, क्यों कि यह जरा लम्बी यात्रा थी। कई मील की दूरियों पर बसे कुछ गोम्फाओं की यात्रा थी। रास्ते भर पहाड़ों के चेहरे मोहरे, तरह तरह की भावभंगिमाएँ देख मन खुश होता रहा। हर जगह नया नजारा, पहाड़ के इतने रूप भी हो सकते हैं मेरी कल्पना के परे था। पहाड़ न हो गए,

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जुले लद्दाख – Part-3 by Rati Saxena

अगला पड़ाव था “स्तोक पैलेस” । यह लेह राज महल है जिसका एक हिस्सा सैलानियों के लिए खोल दिया गया है। इसे 17 वी सदी में राजा सिग्गे नंगियाल के लिए बनवाया गया था, बाद में 1830 में राजपरिवार इसे छोड़ कर स्तोक में बसना पड़ा। यह नंगियाल पहाड़ी पर बना हुआ है। आम राजमहलों की तरह इसके  अन्दर जाने

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