जब मैंने लिखना शुरु किया
Rati Saxena मेरे अक्षरों ने अर्थों से नाता तोड़ लिया ध्वनियां भी रूठ, दूर दूर चलने लगीं कबूतर के पंखों की फड़फड़ाहट के आरोह अवरोह रचना चाहती मेरे अक्षर “क” की कड़कड़ाहट के साथ, “फ” की फटकार के साथ बन्द हो जाते नीलेपन की परते उतारने में मेरे शब्द लड़खड़ा कर रुक जाते हैं माटी का मीठापन “म” से “अहम”
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