बुढ़ाती है क़ायनात हमारे साथ!
Rati Saxena
उम्र सभी की बढ़ती है,
हमारे साथ उम्र दार होती हैं
घर की छिपकलियां,
चींटियों की बीसवीं पीढ़ी ,
घर की सहायिका,
धोबी, लोहा कर कपडों को चमकाने वाले
उम्र दार होता है घर का कोना कोना,
छत की जमीन, मुंडेर की पकड़.
उम्र दार होते कुर्सी मेज, बिछावन उठावन ,
दीवारों की चमक.
बूढ़ी हो जाती है घर की गंध,
कपड़ों की महक.
जागती रातें,
सोते हुए दिन,
झुर्रीदार उंगलियां,
चश्मे की कमानी…
अकेले हम ही कहां बुढ़ाते हैं?
बुढ़ाती है क़ायनात हमारे साथ!