जब मैंने लिखना शुरु किया

Rati Saxena

मेरे अक्षरों ने अर्थों से नाता तोड़ लिया

ध्वनियां भी रूठ, दूर दूर चलने लगीं

कबूतर के पंखों की फड़फड़ाहट के आरोह अवरोह रचना चाहती

मेरे अक्षर “क” की कड़कड़ाहट के साथ, “फ” की फटकार के साथ बन्द हो जाते

नीलेपन की परते उतारने में मेरे शब्द लड़खड़ा कर रुक जाते हैं

माटी का मीठापन “म” से “अहम” में बदल जाता है

मेरे भाव बाहर की ओर देखना भूल,

भीतरी कूप में डुबक- डुबक करते रहते हैं,

मैं झील के रंग पकड़ना चाहती , मेरे शब्द

मरी मछली से सतह पर उतराने लगते,

मैं पीड़ा की गहराई में उतरना

सूखी जमीन की दरार में पैठना

फक्कड़पने की हंसी को पकड़ना

चाहती, लेकिन अक्सर मेरे शब्द

मुझे धोखा दे देते, मैं वही लिख पाती

जो मेरे अक्षर मुझसे लिखवाते हैं

जब से मैंने लिखना शुरु किया

कोष्ठक मेरा स्थाई आवास बन गया…..